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Thursday, 23 November 2017

श्री लक्ष्मी कवचम्

श्री लक्ष्मी कवचम्

श्री लक्ष्मी कवचम्


महालक्ष्म्याः प्रवक्ष्यामि कवचं सर्वकामदम् ।
सर्वपापप्रशमनं दुष्टव्याधिविनाशनम् ॥ १॥
ग्रहपीडाप्रशमनं ग्रहारिष्टप्रभञ्जनम् ।
दुष्टमृत्युप्रशमनं दुष्टदारिद्र्यनाशनम् ॥ २॥
पुत्रपौत्रप्रजननं विवाहप्रदमिष्टदम् ।
चोरारिहं च जपतां अखिलेप्सितदायकम् ॥ ३॥
सावधानमना भूत्वा श्रुणु त्वं शुक सत्तम ।
अनेकजन्मसंसिद्धिलभ्यं मुक्तिफलप्रदम् ॥ ४॥
धनधान्यमहाराज्यसर्वसौभाग्यकल्पकम् ।
सकृत्स्मरणमात्रेण महालक्ष्मीः प्रसीदति ॥ ५॥
क्षीराब्धिमध्ये पद्मानां कानने मणिमण्टपे ।
तन्मध्ये सुस्थितां देवीं मनीषाजनसेविताम् ॥ ६॥
सुस्नातां पुष्पसुरभिकुटिलालकबन्धनाम् ।
पूर्णेन्दुबिम्बवदनां अर्धचन्द्रललाटिकाम् ॥ ७॥
इन्दीवरेक्षणां कामकोदण्डभ्रुवमीश्वरीम् ।
तिलप्रसवसंस्पर्धिनासिकालङ्कृतां श्रियम् ॥ ८॥
कुन्दकुड्मलदन्तालिं बन्धूकाधरपल्लवाम् ।
दर्पणाकारविमलकपोलद्वितयोज्ज्वलाम् ॥ ९॥
रत्नताटङ्ककलितकर्णद्वितयसुन्दराम् ।
माङ्गल्याभरणोपेतां कम्बुकण्ठीं जगत्प्रियाम् ॥ १०॥
तारहारिमनोहारिकुचकुम्भविभूषिताम् ।
रत्नाङ्गदादिललितकरपद्मचतुष्टयाम् ॥ ११॥
कमले च सुपत्राढ्ये ह्यभयं दधतीं वरम् ।
रोमराजिकलाचारुभुग्ननाभितलोदरीम् ॥ १२॥
पत्तवस्त्रसमुद्भासिसुनितम्बादिलक्षणाम् ।
काञ्चनस्तम्भविभ्राजद्वरजानूरुशोभिताम् ॥ १३॥
स्मरकाह्लिकागर्वहारिजम्भां हरिप्रियाम् ।
कमठीपृष्ठसदृशपादाब्जां चन्द्रसन्निभाम् ॥ १४॥
पङ्कजोदरलावण्यसुन्दराङ्घ्रितलां श्रियम् ।
सर्वाभरणसंयुक्तां सर्वलक्षणलक्षिताम् ॥ १५॥
पितामहमहाप्रीतां नित्यतृप्तां हरिप्रियाम् ।
नित्यं कारुण्यललितां कस्तूरीलेपिताङ्गिकाम् ॥ १६॥
सर्वमन्त्रमयां लक्ष्मीं श्रुतिशास्त्रस्वरूपिणीम् ।
परब्रह्ममयां देवीं पद्मनाभकुटुम्बिनीम् ।
एवं ध्यात्वा महालक्ष्मीं पठेत् तत्कवचं परम् ॥ १७॥
ध्यानम् ।एकं न्यञ्च्यनतिक्षमं ममपरं चाकुञ्च्यपदाम्बुजं
मध्ये विष्टरपुण्डरीकमभयं विन्यस्तहस्ताम्बुजम् ।
त्वां पश्येम निषेदुषीमनुकलङ्कारुण्यकूलङ्कष-
स्फारापाङ्गतरङ्गमम्ब मधुरं मुग्धं मुखं बिभ्रतीम् ॥ १८
अथ कवचम् ।महालक्ष्मीः शिरः पातु ललाटं मम पङ्कजा ।
कर्णे रक्षेद्रमा पातु नयने नलिनालया ॥ १९॥
नासिकामवतादम्बा वाचं वाग्रूपिणी मम ।
दन्तानवतु जिह्वां श्रीरधरोष्ठं हरिप्रिया ॥ २०॥
चुबुकं पातु वरदा गलं गन्धर्वसेविता ।
वक्षः कुक्षिं करौ पायूं पृष्ठमव्याद्रमा स्वयम् ॥ २१॥
कटिमूरुद्वयं जानु जघं पातु रमा मम ।
सर्वाङ्गमिन्द्रियं प्राणान् पायादायासहारिणी ॥ २२॥
सप्तधातून् स्वयं चापि रक्तं शुक्रं मनो मम ।
ज्ञानं बुद्धिं महोत्साहं सर्वं मे पातु पङ्कजा ॥ २३॥
मया कृतं च यत्किञ्चित्तत्सर्वं पातु सेन्दिरा ।
ममायुरवतात् लक्ष्मीः भार्यां पुत्रांश्च पुत्रिका ॥ २४॥
मित्राणि पातु सततमखिलानि हरिप्रिया ।
पातकं नाशयेत् लक्ष्मीः महारिष्टं हरेद्रमा ॥ २५॥
ममारिनाशनार्थाय मायामृत्युं जयेद्बलम् ।
सर्वाभीष्टं तु मे दद्यात् पातु मां कमलालया॥ २६॥
फलश्रुतिः ।य इदं कवचं दिव्यं रमात्मा प्रयतः पठेत् ।
सर्वसिद्धिमवाप्नोति सर्वरक्षां तु शाश्वतीम् ॥ २७॥
दीर्घायुष्मान् भवेन्नित्यं सर्वसौभाग्यकल्पकम् ।
सर्वज्ञः सर्वदर्शी च सुखदश्च शुभोज्ज्वलः ॥ २८॥
सुपुत्रो गोपतिः श्रीमान् भविष्यति न संशयः ।
तद्गृहे न भवेद्ब्रह्मन् दारिद्र्यदुरितादिकम् ॥ २९॥
नाग्निना दह्यते गेहं न चोराद्यैश्च पीड्यते ।
भूतप्रेतपिशाचाद्याः सन्त्रस्ता यान्ति दूरतः ॥ ३०॥
लिखित्वा स्थापयेद्यत्र तत्र सिद्धिर्भवेत् ध्रुवम् ।
नापमृत्युमवाप्नोति देहान्ते मुक्तिभाग्भवेत् ॥ ३१॥
आयुष्यं पौष्टिकं मेध्यं धान्यं दुःस्वप्ननाशनम् ।
प्रजाकरं पवित्रं च दुर्भिक्षर्तिविनाशनम् ॥ ३२॥
चित्तप्रसादजननं महामृत्युप्रशान्तिदम् ।
महारोगज्वरहरं ब्रह्महत्यादिशोधनम् ॥ ३३॥
महाधनप्रदं चैव पठितव्यं सुखार्थिभिः ।
धनार्थी धनमाप्नोति विवहार्थी लभेद्वधूम् ॥ ३४॥
विद्यार्थी लभते विद्यां पुत्रार्थी गुणवत्सुतम् ।
राज्यार्थी राज्यमाप्नोति सत्यमुक्तं मया शुक ॥ ३५॥
एतद्देव्याःप्रसादेन शुकः कवचमाप्तवान् ।
कवचानुग्रहेणैव सर्वान् कामानवाप सः ॥ ३६॥
इति लक्ष्मीकवचं ब्रह्मस्तोत्रं समाप्तम् ।




कनकधारा स्तोत्र ,, हिन्दी पाठ

कनकधारा स्तोत्र ,, हिन्दी पाठ


 अंग हरे पुलकभूषणमाश्रयंती , भृंगागनेव मुकुलाभरणं तमालम |
अंगीकृताखिलविभूतिर पांग लीला, मांगल्यदास्तु मम मंगदेवताया || 1 ||
मुग्धा मुहुर्विदधाति वदने मुरारेः , प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि |
माला दुशोर्मधुकरीय महोत्पले या, सा में श्रियं दिशतु सागरसंभवायाः || 2 ||
विश्वासमरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्ष , मानन्दहेतुरधिकं मधुविद्विषो पि |
इषन्निषीदतु मयी क्षणमीक्षर्णा, मिन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिरायाः || 3 ||
आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्द, मानन्दकन्मनिमेषमनंगतन्त्रम |
आकेकरस्थितिकनीकिमपक्ष्म नेत्रं, भूत्यै भवेन्मम भुजंगशयांगनायाः || 4 ||
बाह्यंतरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे या, हारावलीव हरीनिलमयी विभाति |
कामप्रदा भागवतोपी कटाक्ष माला, कल्याणमावहतु मे कमलालायायाः || 5 ||
कालाम्बुदालितलिसोरसी कैटमारे, धरिधरे स्फुरति या तु तडंग दन्यै |
मातुः समस्तजगताम महनीयमूर्ति , र्भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनायाः || 6 ||
प्राप्तम पदं प्रथमतः किल यत्प्रभावान, मांगल्यभाजि मधुमाथिनी मन्मथेन |
मययापतेत्तदिह मन्थन मीक्षर्णा, मन्दालसम च मकरालयकन्यकायाः || 7 ||
दाद दयानुपवनो द्रविणाम्बुधारा, मस्मिन्न वि किंधनविहंगशिशौ विपाणे |
दुष्कर्मधर्म मापनीय चिराय दूरं, नारायणप्रगणयिनीनयनाम्बुवाहः || 8 ||
इष्ट विशिष्टमतयोपी यया दयार्द्र, दुष्टया त्रिविष्टपपदं सुलभं लर्भते |
दृष्टिः प्रहष्टकमलोदरदीप्तिरीष्टां, पुष्टि कृपीष्ट मम पुष्करविष्टरायाः || 9 ||
गीर्तेवतेती गरुड़ध्वजभामिनीति, शाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति |
सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायै, तस्यै नमास्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुन्यै || 10 ||
क्ष्फत्यै नमोस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यै, रत्यै नमोस्तु रमणीयगुणार्णवायै |
शक्त्यै नमोस्तु शतपनिकेतनायै, पुष्ट्यै नमोस्तु पुरुषोत्तम वल्लभायै || 11 ||
नमोस्तु नालीकनिभान्नायै, नमोस्तु दुग्धोदधिजन्म भूत्यै |
नमोस्तु सोमामृतसोदरायै , नमोस्तु नारायणवल्लभायै || 12 ||
सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानि, साम्राज्यदान विभवानि सरोरुहाक्षि |
त्वद्वन्द्वनानि दुरिताहरणोद्यतानी , मामेव मातरनिशं कलयन्तु नान्यम || 13 ||
यत्कटाक्ष समुपासनाविधिः, सेवकस्य सकलार्थ सम्पदः |
संतनोति वचनांगमान, सैस्त्वां मुरारीहृदयेश्वरीं भजे || 14 ||
सरसीजनिलये सरोजहस्ते, धवलतमांशु -कगंधमाल्य शोभे |
भगवती हरिवल्लभे मनोज्ञे, त्रिभुवन भूतिकरि प्रसीद मह्यं || 15 ||
दिग्धस्तिभिः कनककुम्भमुखावसृष्ट, स्वर्वाहिनीतिमलाचरूजलप्तुतांगम |
प्रातर्नमामि जगताम जननीमशेष, लोकाधिनाथ गृहिणीम मृताब्धिपुत्रिम || 16 ||
कमले कमलाक्षवल्लभे, त्वम्, करुणापूरतरंगितैपरपाडयै |
अवलोकय ममाकिंचनानां, प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयायाः || 17 ||
स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमू भिरन्वहं, त्रयोमयीं त्रिभुवनमातरम रमाम |
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभामिनी, भवन्ति ते भुवि बुधभाविताशयाः || 18 ||
जैसे भ्रमरी अधखिले कुसुमों से अलंकृत तमाल-तरु का आश्रय लेती है, उसी प्रकार जो प्रकाश श्रीहरि के रोमांच से सुशोभित श्रीअंगों पर निरंतर पड़ता रहता है तथा जिसमें संपूर्ण ऐश्वर्य का निवास है, संपूर्ण मंगलों की अधिष्ठात्री देवी भगवती महालक्ष्मी का वह कटाक्ष मेरे लिए मंगलदायी हो।।1।।
जैसे भ्रमरी महान कमल दल पर मंडराती रहती है, उसी प्रकार जो श्रीहरि के मुखारविंद की ओर बराबर प्रेमपूर्वक जाती है और लज्जा के कारण लौट आती है। समुद्र कन्या लक्ष्मी की वह मनोहर मुग्ध दृष्टिमाला मुझे धन संपत्ति प्रदान करें ।।2।।
जो संपूर्ण देवताओं के अधिपति इंद्र के पद का वैभव-विलास देने में समर्थ है, मधुहन्ता श्रीहरि को भी अधिकाधिक आनंद प्रदान करने वाली है तथा जो नीलकमल के भीतरी भाग के समान मनोहर जान पड़ती है, उन लक्ष्मीजी के अधखुले नेत्रों की दृष्टि क्षण भर के लिए मुझ पर थोड़ी सी अवश्य पड़े।।3।।
शेषशायी भगवान विष्णु की धर्मपत्नी श्री लक्ष्मीजी के नेत्र हमें ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हों, जिनकी पु‍तली तथा बरौनियां अनंग के वशीभूत हो अधखुले, किंतु साथ ही निर्निमेष (अपलक) नयनों से देखने वाले आनंदकंद श्री मुकुन्द को अपने निकट पाकर कुछ तिरछी हो जाती हैं।।4।।
जो भगवान मधुसूदन के कौस्तुभमणि-मंडित वक्षस्थल में इंद्रनीलमयी हारावली-सीसुशोभित होती है तथा उनके भी मन में प्रेम का संचार करने वाली है, वह कमल-कुंजवासिनी कमला की कटाक्षमाला मेरा कल्याण करे।।5।।
* जैसे मेघों की घटा में बिजली चमकती है, उसी प्रकार जो कैटभशत्रु श्रीविष्णु के काली मेघमाला के श्यामसुंदर वक्षस्थल पर प्रकाशित होती है, जिन्होंने अपने आविर्भाव से भृगुवंश को आनंदित किया है तथा जो समस्त लोकों की जननी है, उन भगवती लक्ष्मी की पूजनीय मूर्ति मुझे कल्याण प्रदान करे।।6।
* समुद्र कन्या कमला की वह मंद, अलस, मंथर और अर्धोन्मीलित दृष्टि, जिसके प्रभाव से कामदेव ने मंगलमय भगवान मधुसूदन के हृदय में प्रथम बार स्थान प्राप्त किया था, यहां मुझ पर पड़े।।7।।
* भगवान नारायण की प्रेयसी लक्ष्मी का नेत्र रूपी मेघ दयारूपी अनुकूल पवन से प्रेरित हो दुष्कर्म (धनागम विरोधी अशुभ प्रारब्ध) रूपी धाम को चिरकाल के लिए दूर हटाकर विषाद रूपी धर्मजन्य ताप से पीड़ित मुझ दीन रूपी चातक पर धनरूपी जलधारा की वृष्टि करें।।8।। 
* विशिष्ट बुद्धि वाले मनुष्य जिनके प्रीति पात्र होकर जिस दया दृष्टि के प्रभाव से स्वर्ग पद को सहज ही प्राप्त कर लेते हैं, पद्‍मासना पद्‍मा की वह विकसित कमल-गर्भ के समान कांतिमयी दृष्टि मुझे मनोवांछित पुष्टि प्रदान करें।।9।।
* जो सृष्टि लीला के समय वाग्देवता (ब्रह्मशक्ति) के रूप में विराजमान होती है तथा प्रलय लीला के काल में शाकम्भरी (भगवती दुर्गा) अथवा चन्द्रशेखर वल्लभा पार्वती (रुद्रशक्ति) के रूप में अवस्थित होती है, त्रिभुवन के एकमात्र पिता भगवान नारायण की उन नित्य यौवना प्रेयसी श्रीलक्ष्मीजी को नमस्कार है।।10।।
* मात:। शुभ कर्मों का फल देने वाली श्रुति के रूप में आपको प्रणाम है। रमणीय गुणों की सिंधु रूपा रति के रूप में आपको नमस्कार है। कमल वन में निवास करने वाली शक्ति स्वरूपा लक्ष्मी को नमस्कार है तथा पुष्टि रूपा पुरुषोत्तम प्रिया को नमस्कार है।।11।।
* कमल वदना कमला को नमस्कार है। क्षीरसिंधु सभ्यता श्रीदेवी को नमस्कार है। चंद्रमा और सुधा की सगी बहन को नमस्कार है। भगवान नारायण की वल्लभा को नमस्कार है। ।।12।। 
* कमल सदृश नेत्रों वाली माननीय मां ! आपके चरणों में किए गए प्रणाम संपत्ति प्रदान करने वाले, संपूर्ण इंद्रियों को आनंद देने वाले, साम्राज्य देने में समर्थ और सारे पापों को हर लेने के लिए सर्वथा उद्यत हैं, वे सदा मुझे ही अवलम्बन दें। (मुझे ही आपकी चरण वंदना का शुभ अवसर सदा प्राप्त होता रहे)।।13।।
* जिनके कृपा कटाक्ष के लिए की गई उपासना उपासक के लिए संपूर्ण मनोरथों और संपत्तियों का विस्तार करती है, श्रीहरि की हृदयेश्वरी उन्हीं आप लक्ष्मी देवी का मैं मन, वाणी और शरीर से भजन करता हूं।।14।। 
* भगवती हरिप्रिया! तुम कमल वन में निवास करने वाली हो, तुम्हारे हाथों में नीला कमल सुशोभित है। तुम अत्यंत उज्ज्वल वस्त्र, गंध और माला आदि से सुशोभित हो। तुम्हारी झांकी बड़ी मनोरम है। त्रिभुवन का ऐश्वर्य प्रदान करने वाली देवी, मुझ पर प्रसन्न हो जाओ।।15।। 
* दिग्गजों द्वारा सुवर्ण-कलश के मुख से गिराए गए आकाश गंगा के निर्मल एवं मनोहर जल से जिनके श्री अंगों का अभिषेक (स्नान) संपादित होता है, संपूर्ण लोकों के अधीश्वर भगवान विष्णु की गृहिणी और क्षीरसागर की पुत्री उन जगज्जननी लक्ष्मी को मैं प्रात:काल प्रणाम करता हूं।।16।। 
* कमल नयन केशव की कमनीय कामिनी कमले! 
मैं अकिंचन (दीन-हीन) मनुष्यों में अग्रगण्य हूं, अतएव तुम्हारी कृपा का स्वाभाविक पात्र हूं। तुम उमड़ती हुई करुणा की बाढ़ की तरह तरंगों के समान कटाक्षों द्वारा मेरी ओर देखो।।17।।
* जो मनुष्य इन स्तु‍तियों द्वारा प्रतिदिन वेदत्रयी स्वरूपा त्रिभुवन-जननी भगवती लक्ष्मी की स्तुति करते हैं, वे इस भूतल पर महान गुणवान और अत्यंत सौभाग्यशाली होते हैं तथा विद्वान पुरुष भी उनके मनोभावों को जानने के लिए उत्सुक रहते हैं।।18।।